:- रुद्रप्रयाग के भटवाड़ी गांव के शिक्षक सत्येंद्र भंडारी की अनोखी पहल, पारंपरिक पत्तल-दोने से जुड़ी पहाड़ की पुरानी संस्कृति को फिर मिलेगा अवसर
रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी मांगलिक कार्यक्रमों की पहचान रहे मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल अब आधुनिक दौर में एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने का माध्यम बन रहे हैं। रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के भटवाड़ी गांव निवासी शिक्षक सत्येंद्र भंडारी ने अपनी बेटी की अक्टूबर माह में होने वाली शादी में मेहमानों को मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल में खाना परोसने का निर्णय लिया है। उनकी यह पहल पारंपरिक संस्कृति को पर्यावरण जागरूकता से जोड़ने वाली पहल के रूप में सामने आई है।
फोटो साभार सोशल मीडिया
शादी-विवाह और अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल का इस्तेमाल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लंबे समय से होता आया है। शादी, सगाई, चूड़ाकर्म संस्कार, तेरहवीं और श्राद्ध जैसे आयोजनों में भी इनका उपयोग किया जाता था। कार्यक्रम से कुछ दिन पहले ग्रामीण मालू के पेड़ों से पत्ते तोड़कर लाते थे और परिवार व गांव के लोग मिलकर दोने-पत्तल तैयार करते थे। इस काम में बच्चों में भी खासा उत्साह रहता था।
गांवों में मालू के पेड़ों का किया जाता था संरक्षण
पहाड़ के गांवों में कभी मालू के पेड़ों को विशेष रूप से संरक्षित किया जाता था। खेतों की मेड़ों और जंगलों में इसके पेड़ व बेलें आसानी से दिखाई देती थीं। किसी के खेत या जमीन पर पेड़ होने के बावजूद मांगलिक कार्यों के लिए गांव के लोग इसका सामूहिक रूप से इस्तेमाल करते थे। इस तरह मालू केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और सामुदायिक सहयोग का भी हिस्सा रहा है।
प्लास्टिक ने ली पारंपरिक पत्तल-दोने की जगह
समय के साथ प्लास्टिक और अन्य डिस्पोजेबल सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल से मालू के पत्तों से बनने वाले दोने-पत्तल का चलन कम होता गया। आसानी से उपलब्ध होने और मेहनत कम लगने के कारण आयोजनों में प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल बढ़ा, लेकिन इससे पर्यावरण पर कचरे और प्रदूषण का दबाव भी बढ़ा।
ऐसे में सत्येंद्र भंडारी द्वारा बेटी की शादी में मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल का इस्तेमाल करने का निर्णय पुरानी परंपरा को फिर से सामने लाने के साथ ही प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल विकल्प का संदेश देता है।
‘हल्दी हाथ, मालू पात’ से जुड़ी रही है पहाड़ की परंपरा
उत्तराखंड की लोक संस्कृति में मालू के पत्तों का पारंपरिक महत्व रहा है। मांगलिक कार्यों और विवाह समारोहों के संदर्भ में ‘हल्दी हाथ, मालू पात’ जैसी पारंपरिक कहावत भी प्रचलित रही है। मालू के पत्तों से पत्तल और दोने तैयार कर सामूहिक भोज में भोजन परोसने की परंपरा पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनशैली का हिस्सा रही है।
मालू के पत्तों का इस्तेमाल प्रसिद्ध पहाड़ी मिठाई सिंगौड़ी को तैयार करने और उसकी पारंपरिक पैकिंग में भी किया जाता है। इसके अलावा मालू की बेल और उसके रेशों के विभिन्न पारंपरिक उपयोग भी ग्रामीण जीवन में रहे हैं।
परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
शिक्षक सत्येंद्र भंडारी की यह पहल इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है कि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक तरीकों को अपनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा सकता है। मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल प्राकृतिक सामग्री से तैयार होते हैं और इस्तेमाल के बाद आसानी से प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं। वहीं प्लास्टिक और अन्य डिस्पोजेबल सामग्री लंबे समय तक पर्यावरण में बनी रहती है।
बेटी की शादी जैसे पारिवारिक और सामाजिक आयोजन के माध्यम से मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल को अपनाकर सत्येंद्र भंडारी ने पहाड़ की पुरानी परंपरा और वर्तमान पर्यावरणीय जरूरत के बीच एक कड़ी जोड़ने का प्रयास किया है।