युवाओं से सपने पूछने से पहले सरकार अपना पांच साल का रिपोर्ट कार्ड दिखाए : गरिमा दसौनी

कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता का मुख्यमंत्री के ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ युवा संवाद कार्यक्रम पर निशाना, कहा- युवाओं को भाषण नहीं, रोजगार और अवसर चाहिए

देहरादून। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ युवा संवाद कार्यक्रम पर निशाना साधते हुए कहा कि मुख्यमंत्री आज युवाओं से उनके सपने पूछ रहे हैं, लेकिन प्रदेश का युवा सरकार से पूछ रहा है कि उसके सपनों को रोजगार और अवसर में बदलने के लिए पिछले वर्षों में क्या किया गया।

गरिमा दसौनी ने कहा कि युवाओं से उनके सपने पूछना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन उस युवा की स्थिति पर भी सरकार को जवाब देना चाहिए, जिसके हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। उन्होंने कहा कि कई युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर विवाद खड़े हो जाते हैं। ऐसे में सरकार को यह बताना चाहिए कि युवाओं की इन समस्याओं के समाधान के लिए उसने क्या ठोस कदम उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को युवाओं से ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ पूछने से पहले ‘मेरी सरकार ने उत्तराखंड के युवाओं के लिए क्या किया’ विषय पर संवाद करना चाहिए था। यदि सरकार वास्तव में युवाओं की आवाज सुनना चाहती है तो केवल मंच से सुझाव लेने के बजाय उनके सवालों का सीधा जवाब भी देना चाहिए।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि सरकार रोजगार के आंकड़े गिनाकर अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन युवा जानना चाहता है कि कितने युवाओं को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार मिला, कितनी भर्तियां समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पूरी हुईं, कितने पद अभी भी रिक्त हैं और पहाड़ के कितने युवाओं को उनके घर के आसपास रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का युवा केवल सरकारी नौकरी नहीं मांग रहा है। वह बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं, स्थानीय स्तर पर रोजगार, सुरक्षित भविष्य और पलायन रोकने के लिए ठोस नीति चाहता है। युवाओं को भाषण नहीं, अवसर और घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीन पर परिणाम चाहिए।

गरिमा दसौनी ने सवाल उठाया कि यदि सरकार ने युवाओं के लिए इतना काम किया है तो फिर बेरोजगारी, पलायन और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं की बेचैनी क्यों बनी हुई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश का पढ़ा-लिखा युवा रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जाने को मजबूर हो रहा है।

उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री जी, युवाओं के सपनों का डेटा इकट्ठा करने से पहले उनकी हकीकत का सामना कीजिए। उत्तराखंड का युवा अब ‘सपनों का उत्तराखंड’ नहीं, ‘मौकों का उत्तराखंड’ चाहता है। वह यह नहीं सुनना चाहता कि सरकार क्या सपना देख रही है, बल्कि यह जानना चाहता है कि उसके अपने सपने कब पूरे होंगे।”

गरिमा दसौनी ने कहा कि 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में सरकार जितने चाहे संवाद कर ले, लेकिन उत्तराखंड का युवा 2026 में ही अपना हिसाब-किताब तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और सरकारी कार्यक्रमों में युवाओं की बातें सुनने से अधिक जरूरी उनकी समस्याओं पर जमीन पर काम दिखाई देना है। युवा संवाद तभी सार्थक होगा, जब युवाओं के सवालों का जवाब भी मिलेगा, अन्यथा यह संवाद कम और चुनावी फोटो-ऑप अधिक नजर आएगा।

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