: आईआईटी, एयरफोर्स, बैंकिंग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कई बार मेरिट से चूकने के बावजूद नहीं मानी हार, आज शिक्षक, मेंटर और मोटिवेशनल गाइड के रूप में बना रहीं विद्यार्थियों का भविष्य
देहरादून, 22 जून। “रास्ते बदलो, लेकिन मकसद नहीं; इरादे बदलो, लेकिन जुनून नहीं”—इस विचार को साकार कर दिखाया है प्रियांशी रावत ने। अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के बेहद करीब पहुंचने के बावजूद बार-बार असफलताओं का सामना करने वाली प्रियांशी आज सैकड़ों विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।
प्रियांशी रावत, वरिष्ठ फुटबॉल प्रशिक्षक, पूर्व राष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. वीरेन्द्र सिंह रावत की पुत्री हैं। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन की घोषणा वाले दिन उनका जन्म देहरादून के दून अस्पताल में हुआ था। बचपन से ही मेधावी रही प्रियांशी ने हाईस्कूल, इंटरमीडिएट, बीएससी तथा एमएससी (गणित) में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
इंटरमीडिएट के दौरान उनका सपना आईआईटी से कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने का था। उन्होंने दो बार आईआईटी प्रवेश परीक्षा दी और सामान्य वर्ग में सफल भी रहीं, लेकिन मामूली अंतर से अंतिम चयन नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना की एफ-कैट परीक्षा कई बार उत्तीर्ण की, एसएसबी और मेडिकल चरण भी पार किए, लेकिन अंतिम मेरिट सूची में स्थान नहीं बना सकीं।
इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। बैंक पीओ, एलआईसी अधिकारी सहित कई अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्रयास जारी रखा। असफलताओं के बावजूद उनका आत्मविश्वास और मेहनत कम नहीं हुई। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र बनाया और आज कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों को गणित, अंग्रेजी, सामान्य ज्ञान, एनडीए, सीडीएस, सैनिक स्कूल, आरआईएमसी तथा एसएसबी की तैयारी करवा रही हैं। उनके पढ़ाए कई छात्र आज भारतीय सेना में चयनित हो चुके हैं।
प्रियांशी वर्तमान में ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से शिक्षक, मेंटर, काउंसलर और मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में कार्य कर रही हैं। वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर रही हैं। साथ ही उन्होंने अपने पिता की देहरादून फुटबॉल अकादमी में समन्वयक के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एनसीसी में भी उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है।
डॉ. वीरेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि बच्चों के जीवन निर्माण में माता-पिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उचित संस्कार, समय-समय पर प्रोत्साहन और सकारात्मक मार्गदर्शन बच्चों को सही दिशा देता है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में परीक्षा परिणाम या अन्य कारणों से निराश होकर कई युवा गलत कदम उठा लेते हैं, जबकि जीवन में आगे बढ़ने के अनेक अवसर मौजूद होते हैं।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि असफलताओं से घबराने के बजाय उन्हें सीख के रूप में स्वीकार करें। सफलता का मार्ग कभी सीधा नहीं होता, लेकिन निरंतर प्रयास, आत्मविश्वास और धैर्य अंततः मंजिल तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन अमूल्य है और हर परिस्थिति में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।