लोकगायिका सीमा पंगरियाल बोलीं—सम्मान के नाम पर महज औपचारिकता क्यों?
लोकगायिका सीमा पंगरियाल बोलीं—कलाकारों के वर्षों के संघर्ष और योगदान का हो पारदर्शी मूल्यांकन, पहचान और पहुंच नहीं बल्कि कला बने सम्मान का आधार
देहरादून। उत्तराखंड में आयोजित किए जा रहे विभिन्न सम्मान समारोहों को लेकर सुप्रसिद्ध लोकगायिका सीमा पंगरियाल ने सवाल उठाए हैं। फेसबुक पर साझा किए गए अपने विचारों में उन्होंने कहा कि कलाकार के लिए सम्मान गर्व का विषय है, लेकिन सम्मान केवल मंच पर बुलाने, फोटो खिंचवाने और हाथों में एक पुस्तक थमा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
सीमा पंगरियाल ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के दूर-दराज गांवों से अनेक लोककलाकार अपनी लोकसंस्कृति, माटी और जड़ों के प्रति समर्पण के साथ राजधानी और बड़े शहरों तक पहुंचते हैं। इन कलाकारों को उम्मीद रहती है कि उनके वर्षों के संघर्ष, साधना और सांस्कृतिक योगदान को उचित पहचान मिलेगी। ऐसे में यदि सम्मान समारोह में उन्हें अपेक्षित गरिमा महसूस नहीं होती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग
लोकगायिका ने सम्मान समारोहों में कलाकारों के चयन और प्राथमिकता को लेकर भी पारदर्शिता की आवश्यकता बताई। उनका कहना है कि सम्मान का आधार कलाकार की कला, साधना और सांस्कृतिक योगदान होना चाहिए, न कि केवल पहचान, परिचय, पहुंच या आपसी संबंध।
उन्होंने कहा कि कलाकार छोटा-बड़ा नहीं होता। उसकी कला और समाज व संस्कृति के लिए उसका योगदान महत्वपूर्ण होता है। वर्षों से लोकगीत, लोकसंगीत और लोकभाषा को जीवित रखने वाले कलाकारों के योगदान का उचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
ट्रस्टों और संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल
सीमा पंगरियाल ने अपने बयान में विभिन्न ट्रस्टों और संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि कोई संस्था कलाकारों के सम्मान के लिए कार्यक्रम आयोजित करती है, तो उसकी चयन प्रक्रिया स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कहीं सम्मान समारोह कलाकारों को केंद्र में रखने के बजाय आयोजकों की प्रतिष्ठा बढ़ाने का माध्यम तो नहीं बन रहे।
उन्होंने आयोजनों में उद्घोषकों की सूची, सम्मानित होने वाले कलाकारों के नाम और मंच पर मिलने वाली प्राथमिकता को लेकर भी निष्पक्षता की जरूरत बताई।
किताब देना गलत नहीं, लेकिन सम्मान की गरिमा भी जरूरी
पंगरियाल ने स्पष्ट किया कि किसी कलाकार को पुस्तक भेंट करना अपने आप में गलत नहीं है। उनका सवाल सम्मान की उस भावना से है, जिसके साथ कलाकार समारोह में पहुंचता है। उनके अनुसार कलाकार के वर्षों के समर्पण के अनुरूप उसे पहचान और गरिमा मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल मंचों, ट्रस्टों और बड़े आयोजनों से संरक्षित नहीं होगी। इसके लिए उन लोकगायकों, गीतकारों, संगीतकारों और सांस्कृतिक साधकों को उचित पहचान देनी होगी, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोकपरंपराओं को आगे बढ़ाया है।
“सम्मान उपहार नहीं, वर्षों के समर्पण की पहचान है”
सीमा पंगरियाल ने कहा कि सम्मान किसी कलाकार के लिए महज उपहार नहीं, बल्कि उसके वर्षों के समर्पण और योगदान की पहचान है। यदि सम्मान समारोह आयोजित करने वाली संस्थाएं वास्तव में लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए काम करना चाहती हैं, तो उन्हें कलाकारों के चयन में समान अवसर और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था विशेष को निशाना बनाना उनका उद्देश्य नहीं है, बल्कि ऐसी सोच पर सवाल उठाना जरूरी है, जो सम्मान को केवल औपचारिकता बना देती है।
अंत में उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को जीवित रखना है तो सबसे पहले उसके साधकों का सम्मान करना होगा। कलाकारों को केवल मंच पर बुलाने से संस्कृति का संरक्षण नहीं होता, बल्कि उन्हें सच्ची पहचान, समान अवसर और उचित गरिमा देने से ही लोकसंस्कृति को मजबूती मिल सकती है।