:- पूर्व मुख्यमंत्री ने धार्मिक कट्टरता पर उठाए सवाल, कहा—किसी की आस्था पर पाबंदी लगाने वाले न हिंदुओं के हितैषी हैं, न मुसलमानों के
धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सद्भाव की पैरवी, बोले—हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार धार्मिक स्थलों पर जाने का अधिकार
देहरादून। बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली खान के केदारनाथ धाम जाने को लेकर कथित तौर पर फतवा जारी किए जाने की खबरों पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने धार्मिक कट्टरता पर सवाल उठाते हुए कहा कि धर्मपरायण होना और कट्टर होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था पर सवाल उठाना या उसे किसी धार्मिक स्थल पर जाने से रोकना उचित नहीं है। ऐसी मानसिकता समाज और देश के लिए चिंताजनक है।
हरीश रावत ने कहा कि आज समाचार पत्र में एक चिंताजनक खबर पढ़ने को मिली। अभिनेत्री सारा अली खान श्रद्धापूर्वक केदारनाथ धाम पहुंचती हैं। वह पहले भी केदारनाथ गई हैं और इस बार भी पहुंचीं। वह नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर की पोती तथा सैफ अली खान की बेटी हैं। उनकी केदारनाथ धाम में आस्था है और वह अपने पिता से मिले धर्म का भी पालन करती हैं। इसके बावजूद कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग उनके केदारनाथ जाने को लेकर फतवा जारी कर रहे हैं।
कट्टरपंथी सोच समाज और देश को कहां ले जाएगी?
पूर्व मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि आखिर यह कट्टरपंथी मानसिकता समाज और देश को किस दिशा में ले जा रही है? उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने और उसके अच्छे गुणों का प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी दूसरे व्यक्ति की आस्था पर प्रतिबंध लगाया जाए।
उन्होंने कहा, “धर्मपरायण होना एक बात है और कट्टर होना दूसरी बात। आप उदार रहकर भी धर्मपरायण हो सकते हैं। अपने धर्म का पालन करिए, उसके गुणों का प्रचार करिए, लेकिन कोई किसी देवता में आस्था रखता है तो उसे रोकने का अधिकार किसी को नहीं है।”
आस्था और मूर्ति पूजा में अंतर समझना जरूरी
हरीश रावत ने कहा कि वह जानते हैं कि इस्लाम में मूर्ति पूजा की परंपरा नहीं है, लेकिन आस्था और मूर्ति पूजा के बीच अंतर को भी समझना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल पर जाता है, तो यह जरूरी नहीं कि वह वहां केवल उसी धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजा कर रहा हो। संभव है कि वह वहां ध्यान लगाकर अपने आराध्य या अल्लाह को याद कर रहा हो।
उन्होंने कहा कि दुनिया की समस्त भूमि ईश्वर की है। कोई उसे नारायण कहता है, कोई अल्लाह और कोई गॉड। ऐसे में किसी धार्मिक स्थल पर जाने को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।
कट्टरपंथी न हिंदुओं के हितैषी, न मुसलमानों के
हरीश रावत ने धार्मिक कट्टरता को लेकर दोनों समुदायों के कट्टरपंथी तत्वों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ऐसी मानसिकता किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो केवल चर्चा में बने रहने के लिए विवाद खड़े करते हैं और समाज को नुकसान पहुंचाते हैं।
उन्होंने कहा कि जब भी ऐसी खबरें सामने आती हैं, तो दुख होता है। धर्म के नाम पर समाज में विभाजन पैदा करने वाले लोग न हिंदुओं के हितैषी हैं, न मुसलमानों के। वास्तव में वे अपने धर्म के भी हितैषी नहीं हैं।
धार्मिक सद्भाव और सहिष्णुता से ही मजबूत होगा समाज
पूर्व मुख्यमंत्री ने धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और परस्पर सम्मान की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आस्था व्यक्तिगत विषय है। हर व्यक्ति को दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। कट्टरता से किसी धर्म का भला नहीं होता, बल्कि इससे समाज में दूरियां और अविश्वास बढ़ता है।
उनका कहना था कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में सभी धर्मों के प्रति सम्मान और आपसी सद्भाव की भावना को मजबूत करना जरूरी है। धार्मिक आस्था को विवाद का विषय बनाने के बजाय समाज को जोड़ने का माध्यम बनाया जाना चाहिए।