सैलजा की रोक के बावजूद हरदा का शक्ति प्रदर्शन, कांग्रेस में संगठन बनाम जनाधार की जंग तेज

:- जसपुर से हल्द्वानी तक ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ में जुटे विधायक-पूर्व विधायक; खुले वाहन में प्रीतम सिंह की मौजूदगी ने बदले सियासी समीकरण, 7-8 अक्टूबर को दिल्ली में सैलजा और वेणुगोपाल से मुलाकात


ओम प्रकाश जोशी, देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से पहले चल रही अंदरूनी खींचतान अब सड़क पर खुलकर दिखाई देने लगी है। प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की आपत्ति और यात्रा रोकने की सलाह के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोमवार को जसपुर से ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ शुरू कर दी। सबसे अहम बात यह रही कि जिस यात्रा को कांग्रेस हाईकमान के स्तर पर समानांतर कार्यक्रम मानकर रोकने की कोशिश की गई थी, उसमें कई मौजूदा विधायक, पूर्व विधायक और पार्टी के वरिष्ठ नेता खुलकर शामिल हुए। इससे उत्तराखंड कांग्रेस में संगठन के निर्देश बनाम हरीश रावत के राजनीतिक जनाधार की लड़ाई और ज्यादा मुखर हो गई है।

जसपुर से सुबह करीब 11.30 बजे शुरू हुआ काफिला रात में हल्द्वानी पहुंचा। पूरे रास्ते समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रावत का स्वागत किया। हल्द्वानी में आयोजित कार्यक्रम में भी बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता जुटे। खुले वाहन में रावत के साथ चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह की मौजूदगी और नारेबाजी ने सबसे ज्यादा राजनीतिक संकेत दिए। माना जा रहा है कि प्रीतम सिंह की सक्रिय भागीदारी ने यात्रा को महज रावत समर्थकों के कार्यक्रम की धारणा से बाहर निकालकर इसे पार्टी के भीतर व्यापक समर्थन मिलने का संदेश दे दिया।

सैलजा के पत्र के चार दिन बाद ही सड़क पर जवाब :-
एक अक्टूबर को प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने हरीश रावत को पत्र भेजकर यात्रा रोकने का आग्रह किया था। पत्र में कहा गया था कि यात्रा को लेकर न तो उनसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से चर्चा की गई। सैलजा ने चुनाव से कुछ माह पहले ऐसे समानांतर कार्यक्रम को पार्टी हित में नहीं बताया था। उन्होंने रावत के हालिया कुछ बयानों को भी विवादास्पद बताते हुए संगठन की एकजुटता पर जोर दिया था।

लेकिन रावत ने कार्यक्रम स्थगित करने के बजाय सोशल मीडिया के जरिए अपने तेवर साफ कर दिए। उन्होंने लिखा कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए संकल्प दृढ़ है और अब रुकना नहीं है। इसके बाद जसपुर से हल्द्वानी तक निकली यात्रा ने पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों को सार्वजनिक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल दिया।

‘हाथ में तिरंगा है, कार्यक्रम कांग्रेस का नहीं’ :-
सैलजा की आपत्ति पर रावत ने अपना बचाव करते हुए कहा कि बीमारी से उबरने के बाद वह अपने शुभचिंतकों का आभार जताने और उनसे संवाद करने निकले हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके हाथ में तिरंगा जरूर है, लेकिन उन्होंने अपने कार्यक्रम को कांग्रेस का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं बनाया है। उनके अनुसार कांग्रेस कार्यकर्ता वर्षों के जुड़ाव और उत्साह के कारण स्वेच्छा से कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं।

रावत का यह तर्क कांग्रेस संगठन के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा करता है। यदि कार्यक्रम निजी है तो उसमें बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों और वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी संगठन के भीतर रावत के प्रभाव का संकेत देती है। वहीं यदि इसे पार्टी गतिविधि माना जाता है तो सैलजा की आपत्ति और संगठनात्मक अनुशासन का सवाल और गंभीर हो जाता है।

प्रीतम की मौजूदगी ने बदल दिया समीकरण :-
यात्रा के दौरान प्रीतम सिंह की मौजूदगी को कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। रावत और प्रीतम को लंबे समय से पार्टी के अलग-अलग राजनीतिक ध्रुवों के तौर पर देखा जाता रहा है। ऐसे में एक ही खुले वाहन में दोनों नेताओं की मौजूदगी और कार्यकर्ताओं के बीच संयुक्त नारेबाजी ने कई पुराने राजनीतिक समीकरणों को हिला दिया है।

यात्रा में विधायक मदन बिष्ट, तिलकराज बेहड़, आदेश चौहान, हरीश धामी, मनोज तिवारी और सुमित हृदयेश समेत कई विधायक नजर आए। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, पूर्व विधायक हेमेश खरक्वाल, ललित फर्स्वाण, नारायण पाल, प्रेमानंद महाजन और मेयर प्रत्याशी ललित जोशी समेत बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने भी रावत के अभियान को मजबूती दी।

खास बात यह रही कि रावत के विरोधी खेमे से जोड़े जाने वाले द्वाराहाट विधायक मदन बिष्ट ने भी हल्द्वानी में उनके अभियान की तारीफ की। इससे संकेत गया कि रावत के मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर राजनीतिक सीमाएं पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

हरदा ने कहा- बदलाव की शुरुआत कर दी :-
हल्द्वानी में रावत ने कहा कि जमीन से बदलाव की आवाज आ रही है। उन्होंने प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का दावा करते हुए कहा कि वर्ष 2029 में राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। भाजपा पर सीबीआई, ईडी समेत कई मुद्दों को लेकर हमला बोलते हुए उन्होंने कांग्रेस संगठन को भी दो टूक संदेश दिया।

रावत ने कहा कि उन्होंने बदलाव की शुरुआत कर दी है और अब जहां भी पार्टी को जरूरत होगी, वह मौजूद रहेंगे। तराई क्षेत्र में पिछले एक सप्ताह में पार्टी का कोई कार्यक्रम न होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से संगठन की चुनावी सक्रियता पर भी सवाल खड़े किए।

बीमारी से उठने के बाद 80 वर्ष की उम्र में रावत का सड़क पर उतरना उनके समर्थकों के लिए भावनात्मक और राजनीतिक दोनों संदेश लेकर आया। हल्द्वानी में नेताओं ने भाजपा को सत्ता से हटाने का संकल्प लिया और रावत की मुहिम को समर्थन दिया।

हाईकमान की रणनीति को झटका या रावत का शक्ति प्रदर्शन?
सैलजा के पत्र के बाद कांग्रेस के भीतर यह आकलन था कि रावत की यात्रा को व्यापक समर्थन नहीं मिलेगा और संगठन के अधिकांश नेता इससे दूरी बनाए रखेंगे। लेकिन जसपुर से हल्द्वानी तक जिस तरह विधायक, पूर्व विधायक और कार्यकर्ता जुटे, उससे यह आकलन फिलहाल कमजोर पड़ा है।

खासकर प्रीतम सिंह की मौजूदगी ने हाईकमान के सामने नई राजनीतिक तस्वीर पेश कर दी है। रावत को चुनावी टीम से करीब एक साल पहले बाहर किए जाने के बाद यह यात्रा उनके लिए अपने राजनीतिक प्रभाव का प्रदर्शन भी मानी जा रही है।

हालांकि कांग्रेस का एक गुट अब भी इस अभियान से दूरी बनाए हुए है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में यह विवाद केवल यात्रा तक सीमित रहने के बजाय टिकट वितरण, चुनावी नेतृत्व और मुख्यमंत्री चेहरे की राजनीति तक पहुंच सकता है।

अब नजर दिल्ली पर :-
हरीश रावत अब 7 और 8 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। जसपुर से हल्द्वानी तक मिले समर्थन के बाद इन मुलाकातों का महत्व बढ़ गया है।

अब असली सवाल यही है कि दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व रावत की यात्रा को संगठनात्मक अनुशासन का उल्लंघन मानकर सख्त रुख अपनाता है या फिर यात्रा में जुटे विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के समर्थन को देखते हुए उनके साथ राजनीतिक समन्वय का रास्ता तलाशता है।

फिलहाल इतना साफ है कि सैलजा की चिट्ठी ने जिस यात्रा को रोकने की कोशिश की थी, वह जसपुर से हल्द्वानी पहुंचते-पहुंचते हरीश रावत के राजनीतिक प्रभाव के शक्ति प्रदर्शन में बदल गई। उत्तराखंड कांग्रेस में अब मुकाबला केवल भाजपा से नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति और नेतृत्व की दिशा को लेकर पार्टी के भीतर भी दिखाई देने लगा है।

सियासी तस्वीर के पांच बड़े संकेत :-
: सैलजा की रोक के बावजूद यात्रा जारी — संगठन के निर्देश को रावत ने नहीं माना।

: प्रीतम सिंह की मौजूदगी — रावत की यात्रा को सबसे बड़ा राजनीतिक समर्थन।

: कई विधायक और पूर्व विधायक साथ — संगठन के भीतर रावत के प्रभाव का संकेत।

: मदन बिष्ट का समर्थन — विरोधी खेमे के माने जाने वाले नेता का रावत की मुहिम की तारीफ करना अहम।

: 7-8 अक्टूबर की दिल्ली मुलाकात — अब विवाद का अगला अध्याय हाईकमान के साथ बातचीत में तय होगा।

मामला अब ‘हाईकमान बनाम जनाधार’ :-
‘हरदा बनाम सैलजा’ से आगे बढ़कर मामला अब ‘हाईकमान बनाम जनाधार’ की बहस बनता दिख रहा है। सैलजा संगठन की एकजुटता और सामूहिक चुनावी रणनीति पर जोर दे रही हैं, जबकि रावत सड़क पर उतरकर यह संदेश दे रहे हैं कि चुनावी राजनीति में उनका जनसंपर्क और राजनीतिक प्रभाव अब भी निर्णायक है। जसपुर-हल्द्वानी यात्रा में विधायकों और प्रीतम सिंह की मौजूदगी ने इस टकराव को और दिलचस्प बना दिया है।

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