:- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह और गोवर्धन लीला का भावपूर्ण वर्णन, “राधे-श्याम” के जयकारों से गूंजा कथा पंडाल
मोनाल एक्सप्रेस, देहरादून। देहरादून के रेंजर्स ग्राउंड में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस का आयोजन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के बीच संपन्न हुआ। कथा में उत्तराखंड के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी, कैबिनेट मंत्री खजान दास जी, देहरादून के महापौर सौरभ थपलियाल जी तथा श्याम अग्रवाल जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस पावन अवसर पर मुख्यमंत्री ने कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सनातन संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों के महत्व पर प्रकाश डाला।
कथा के भव्य आयोजन का संचालन एवं व्यवस्थापन सीमा शर्मा, सुनील शर्मा, संदीप रस्तोगी एवं शिल्प रास्तों द्वारा किया जा रहा है। आयोजकों ने बताया कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंच रहे हैं, जिससे पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा हुआ है।
षष्ठम दिवस पर पूज्य महाराज ने श्रीमद्भागवत महापुराण की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह दिव्य ग्रंथ इतना पावन और कल्याणकारी है कि इसकी कथा सुनने मात्र से प्रेत का भी कल्याण हो जाता है। जब एक प्रेत का कल्याण संभव है, तो जो श्रद्धा और निष्काम भाव से सात दिन तक भागवत कथा का श्रवण करता है, उसका निश्चित ही कल्याण और मोक्ष होता है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा मानव जीवन की दिशा को मोक्ष की ओर मोड़ देती है और जीव को मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर भक्ति में लीन होना सिखाती है।
कथा के दौरान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के विवाह प्रसंग का बड़े ही धूमधाम से वर्णन किया गया। जैसे ही विवाह से जुड़े भजनों की प्रस्तुति हुई, श्रद्धालु भक्ति भाव में झूम उठे। तालियों की गूंज और “राधे-श्याम” के जयकारों से पूरा कथा पंडाल गुंजायमान हो उठा। माहौल ऐसा था मानो साक्षात भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने भक्तों के बीच उपस्थित हों।
महाराज ने आगे कहा कि जो मनुष्य शुद्ध हृदय, श्रद्धा और समर्पण भाव से भागवत कथा सुनता है, वह दैहिक, दैविक और भौतिक—तीनों प्रकार के कष्टों और पापों से मुक्त हो जाता है। भागवत कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा का शुद्धिकरण है, जो जीव को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर परम शांति की ओर ले जाती है।
कथा में गोवर्धन लीला का भी अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र का अभिमान तोड़ने के लिए ब्रजवासियों को गिरिराज पर्वत की पूजा का संदेश देने और फिर सात दिन तक अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी की रक्षा करने की लीला ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि ईश्वर के सामने किसी भी प्रकार का अभिमान टिक नहीं सकता।
पूज्य महाराज ने कहा कि भगवान को किसी भी प्रकार का अभिमान प्रिय नहीं है—न बल का, न धन का, न तन का, न ज्ञान का और न ही पद का। भक्ति का मार्ग नम्रता और विनम्रता से भरा हुआ है, जहां अहंकार का कोई स्थान नहीं होता।
उन्होंने सत्संग और सद्संगति के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन उसके संग के अनुसार ढलता है। सच्चे और सद्गुणी लोगों का साथ हमारे विचार, व्यवहार और संस्कारों को पवित्र बनाता है तथा कठिन समय में सही मार्ग दिखाता है।
कथा के अंत में महाराज ने कहा कि समाज में बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि भगवान उनकी पुकार नहीं सुनते, जबकि वास्तव में वे श्रद्धा और भाव से भगवान को पुकारते ही नहीं। भगवान भाव के भूखे हैं और केवल सच्चे प्रेम, समर्पण और आस्था से ही प्रसन्न होते हैं।