फूलदेई 2026: उत्तरकाशी में लोकपरंपराओं का नवजीवन, बच्चों ने संभाली संस्कृति की विरासत

तीसरे दिन बाल सेवकों ने मंदिर से लेकर जनप्रतिनिधियों के आवास तक पहुँचकर पुष्प अर्पित किए, परंपरा के संरक्षण का लिया संकल्प

मोनाल एक्सप्रेस, उत्तरकाशी, 17 मार्च 2026।
हिमालयी लोकपर्व फूलदेई के माध्यम से उत्तरकाशी में परंपरा और संस्कृति के पुनरुद्धार का एक सराहनीय प्रयास लगातार जारी है। पिछले 10 वर्षों से भगवान श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, उत्तरकाशी में इस उत्सव को विशेष पहल के रूप में मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य भूली-बिसरी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को पुनः समाज में स्थापित करना है।

महंत श्री अजय पुरी जी के नेतृत्व में संचालित यह आयोजन भगवान श्री काशी विश्वनाथ जी की प्रेरणा से निरंतर संरक्षित और संवर्धित किया जा रहा है। चैत्र माह की संक्रांति से शुरू होकर आठ दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक उत्सव में श्री काशी विश्वनाथ गुरुकुलम के बाल सेवक प्रतिदिन मंदिर परिसर की देहरियों में पुष्प अर्पित कर लोकपर्व को जीवंत बनाए रखते हैं।

तृतीय दिवस पर पारंपरिक आयोजन की झलक
फूलदेई 2026 के तीसरे दिन भी बाल सेवकों ने उत्साह और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ कार्यक्रम का आयोजन किया। सर्वप्रथम भगवान श्री काशी विश्वनाथ जी की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद बाल सेवक उत्तरकाशी जिला पंचायत अध्यक्ष के आवास पहुँचे, जहाँ उन्होंने फ्योंली सहित अन्य स्थानीय पुष्पों को देहरियों में अर्पित कर शुभकामनाएँ दीं।

इसके पश्चात बाल सेवकों ने नगर के मंगल घाट और गोपेश्वर मंदिर आदि स्थानों पर जाकर भी पुष्प अर्पित किए, जिससे पूरे नगर में उत्सव की सांस्कृतिक छटा बिखर गई।

जनप्रतिनिधियों का संदेश
इस अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष श्री रमेश चौहान जी ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि
“शिक्षा ही सशक्त भविष्य की कुंजी है। हमारी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव हमारे जीवन मूल्यों को सुदृढ़ करता है और हमें संस्कारवान बनाता है।”

इससे पूर्व आयोजन के दौरान जिलाधिकारी श्री प्रशांत आर्य जी ने भी बच्चों को प्रेरित करते हुए शिक्षा और संस्कृति के महत्व पर जोर दिया था।

प्रकृति और परंपरा का संगम
इस पहल के तहत हिमालयी पुष्पों—विशेषकर फ्योंली और बुरांस—को प्राथमिकता दी जाती है। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को अपने प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के प्रति जागरूक करना है। फूलदेई केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण का सशक्त माध्यम बन चुका है।

इनकी रही सहभागिता
इस अवसर पर अनन्या बिष्ट, वैष्णवी रावत, आस्था रावत, दिव्यांशी कुड़ियाल, श्रेयांश डोभाल, अर्नव पुंडीर, कृष्णा रावत, अंकित, मनदीप रावत, पारस कोटनाला सहित अन्य बाल सेवक उपस्थित रहे। साथ ही सुरेंद्र गंगाड़ी एवं माधव भट्ट की भी सहभागिता रही।

संस्कृति से जुड़ती नई पीढ़ी
फूलदेई उत्सव आज केवल एक पारंपरिक लोकपर्व नहीं रह गया है, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और प्रकृति से जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम बनकर उभर रहा है। उत्तरकाशी की यह पहल सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।

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