:- हाई कोर्ट के आदेश को बताया गलत, आरोपियों को 2 हफ्ते में सरेंडर का निर्देश; राज्य की SLP मंजूर
देहरादून/नई दिल्ली: हल्द्वानी के बनभूलपुरा दंगों से जुड़े बहुचर्चित मामले में उत्तराखण्ड सरकार को बड़ी कानूनी सफलता मिली है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने की, ने नैनीताल हाई कोर्ट द्वारा दो मुख्य आरोपियों जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को दी गई डिफॉल्ट जमानत को निरस्त कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि दोनों आरोपी दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो ट्रायल कोर्ट को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए हिरासत में लेने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को स्वीकार कर लिया गया है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट इस मामले में “पूरी तरह गलत दिशा में चला गया।” सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह मामला व्यापक हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़ा है, जिसमें पुलिस स्टेशन को भी आग के हवाले कर दिया गया था।
यह मामला 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में हुए दंगों से संबंधित है, जहां हिंसक भीड़ ने फायरिंग, पथराव और पेट्रोल बम का इस्तेमाल किया था। पुलिस वाहनों को जलाने के साथ-साथ महिला कांस्टेबलों को थाने में बंद कर दिया गया और बाद में थाना भी जला दिया गया। घटना के संबंध में IPC, UAPA की धाराओं 15 व 16 तथा आर्म्स एक्ट सहित कई गंभीर धाराओं में तीन अलग-अलग FIR दर्ज की गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट द्वारा जांच प्रक्रिया पर की गई टिप्पणियां तथ्यात्मक रूप से गलत थीं। अदालत ने जांच एजेंसी की सराहना करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में आरोपी और गवाह होने के बावजूद जांच तेजी और दक्षता से आगे बढ़ाई गई।
न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण बिंदु भी उठाया कि आरोपियों ने समय विस्तार और जमानत खारिज होने के आदेशों को समय रहते चुनौती नहीं दी और लगभग दो महीने बाद अपील दायर की। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपियों ने अपने आचरण से डिफॉल्ट जमानत मांगने का अधिकार खो दिया था।
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता जतिंदर कुमार सेठी और स्टैंडिंग काउंसिल आशुतोष कुमार शर्मा ने प्रभावी पक्ष रखा, जबकि आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने पैरवी की।
राज्य अभियोजन विभाग ने इसे कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से एक बड़ी जीत बताया है। यह मामला विशेष रूप से संवेदनशील था क्योंकि हिंसक भीड़ ने सीधे पुलिस और सरकारी मशीनरी को निशाना बनाया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच की सराहना से राज्य पुलिस का मनोबल भी बढ़ा है।