देहरादून की कुम्हार मंडी में बढ़ी मटकों-सुराहियों की डिमांड बढ़ी
देहरादून। आधुनिक दौर में जहां लोगों की जिंदगी पूरी तरह तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर निर्भर हो चुकी है, वहीं मिट्टी की सौंधी खुशबू एक बार फिर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। भीषण गर्मी के बीच देहरादून में मिट्टी के घड़ों, सुराहियों और मिट्टी के वाटर कूलरों की मांग तेजी से बढ़ी है। इसका असर शहर की कुम्हार मंडी में साफ दिखाई दे रहा है, जहां दिवाली के बाद भी कुम्हारों के चाक लगातार घूम रहे हैं।
देहरादून की कुम्हार मंडी इन दिनों मिट्टी के पारंपरिक और आधुनिक डिजाइन वाले बर्तनों से सजी हुई है। फ्रिज के ठंडे पानी के बजाय लोग अब मटके के प्राकृतिक रूप से ठंडे पानी को प्राथमिकता दे रहे हैं। मिट्टी की बोतलें, डिजाइनर घड़े और आकर्षक वाटर कूलर ग्राहकों को खूब पसंद आ रहे हैं।
*परंपरा और स्वास्थ्य से जुड़ रहे लोग*
बदलते समय के साथ लोग एक बार फिर अपनी जड़ों और पारंपरिक जीवनशैली की ओर लौट रहे हैं। मिट्टी के बर्तनों को न केवल पर्यावरण के अनुकूल माना जा रहा है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी समझा जा रहा है। यही वजह है कि युवाओं और शहरी परिवारों में भी इनकी मांग बढ़ रही है।
कुम्हार अब समय के साथ अपने उत्पादों में बदलाव भी ला रहे हैं। पारंपरिक घड़ों और सुराहियों को आधुनिक डिजाइन और आकर्षक रूप दिया जा रहा है, जिससे ये बाजार में अलग पहचान बना रहे हैं।
*लंबे संघर्ष के बाद लौट रही मुस्कान*
करीब 55 वर्षों से मिट्टी का काम कर रहे कारीगर जीतलाल कक्कड़ बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब फ्रिज और चाइनीज लाइटों के बढ़ते चलन से उनका कारोबार लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया था। दिवाली पर मिट्टी के दीयों की जगह बिजली की लड़ियों ने ले ली थी, जिससे कुम्हारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई थी।
हालांकि अब मिट्टी के वाटर कूलर, बोतलों और अन्य उत्पादों की बढ़ती मांग ने उनके कारोबार में नई जान फूंक दी है। लंबे समय बाद बिक्री बढ़ने से कुम्हारों के चेहरों पर फिर मुस्कान लौटती नजर आ रही है।
*ऑनलाइन बाजार से भी मिल रहा सहारा*
अब मिट्टी के बर्तन केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रह गए हैं। अमेजन जैसी ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर भी मिट्टी के उत्पादों की बिक्री हो रही है। लोग घर बैठे अपनी पसंद के बर्तन ऑर्डर कर रहे हैं। इससे कुम्हारों को बड़ा बाजार मिला है और उनका हुनर देश-विदेश तक पहुंच रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्टार्टअप और व्यापारिक संस्थान मिट्टी के उत्पादों को बढ़ावा दें तो इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ कुम्हारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। मिट्टी के उत्पादों को अपनाकर न केवल पारंपरिक कला को बचाया जा सकता है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ाया जा सकता है।