“मुझे हराने वालों को लोग भूल गए, हरीश रावत आज भी लोगों की जुबान पर”
:अर्जित अवकाश में आत्ममंथन: ‘उत्तराखंडियत’ नैरेटिव, चुनावी हार और अपनी भूमिका पर बोले Harish Rawat
हरीश रावत
ओम प्रकाश जोशी (मोनाल एक्सप्रेस), देहरादून। अर्जित अवकाश के दौरान गहन आत्ममंथन में जुटे उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री Harish Rawat ने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए स्पष्ट संकेत दिया है कि वह उत्तराखंड की राजनीति, कांग्रेस के भविष्य और अपने बहुचर्चित ‘उत्तराखंडियत’ नैरेटिव की प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज भी उत्तराखंड और कांग्रेस को उनकी आवश्यकता है, साथ ही अपने समर्थकों, आलोचकों और आम लोगों से इस पर मार्गदर्शन भी मांगा है।
अपने विस्तृत फेसबुक पोस्ट में हरीश रावत ने बताया कि अर्जित अवकाश का यह 9वां या 10वां दिन उन्हें अपनी पुस्तक ‘उत्तराखंडियत पार्ट-2’ को अंतिम रूप देने का अवसर दे रहा है। उन्होंने कहा कि वह इसमें पिथौरागढ़, सातवें, आठवें और नवें दशक की पदयात्राओं तथा अपने सह-पदयात्रियों पर भी कुछ नए लेख जोड़ना चाहते हैं।
पोस्ट में उन्होंने भाजपा के राष्ट्रवाद आधारित राजनीतिक नैरेटिव के मुकाबले अपने “स्थानीय सांस्कृतिक विकासवाद” और “समावेशी उदार संस्कृति पर आधारित राज्यवाद” की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। रावत ने कहा कि उन्होंने वर्ष 2016 में ही यह भांप लिया था कि राष्ट्रीय राजनीति किस दिशा में जा रही है, जिसके जवाब में उन्होंने ‘उत्तराखंडियत’ को एक समग्र वैचारिक सोच के रूप में आगे बढ़ाया।
उन्होंने स्वीकार किया कि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में यह नैरेटिव अपेक्षित मजबूती नहीं पा सका, लेकिन अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद कांग्रेस का वोट प्रतिशत 35 प्रतिशत से ऊपर बनाए रखने में इस सोच की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके मुताबिक, यह उत्तर भारत में आज भी एक मजबूत राजनीतिक आधार का संकेत है।
सोशल मीडिया और मीडिया में उनके अवकाश को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी रावत ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ लोग उनकी चुनावी हारों को गिनाकर प्रसन्न हो रहे हैं, लेकिन जनता आज भी उन्हें याद करती है और भरोसे के लिए उनकी ओर देखती है। उन्होंने लिखा कि हार के बावजूद “मुझे हराने वालों के नाम लोगों को याद नहीं हैं, मगर हरीश रावत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।”
अपने पोस्ट के अंत में उन्होंने कहा कि वह अभी और समय लेकर अपनी गलतियों का विश्लेषण करेंगे। साथ ही उत्तराखंड के राजनीतिक पर्यवेक्षकों, समर्थकों और आलोचकों से आग्रह किया कि वे उन्हें स्पष्ट रूप से बताएं कि उत्तराखंडियत और कांग्रेस को आज भी हरीश रावत की जरूरत है या नहीं।
यह फेसबुक पोस्ट राज्य की राजनीति में रावत की भविष्य की भूमिका और कांग्रेस के भीतर उनके संभावित सक्रिय तेवरों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे रही है।