ग्राफिक एरा अस्पताल ने सर्जरी से पार्किंसंस बीमारी का सफल उपचार किया

 देहरादून। पार्किंसंस का इलाज अब देहरादून में ही हो जाएगा। ग्राफिक एरा अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी से एक 65 वर्षीय महिला का उपचार किया है।

अस्पताल में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ग्राफिक एरा अस्पताल के न्यूरोसाइंस विभाग के निदेशक और सर्जरी करने वाले विशेषज्ञों की टीम के प्रमुख डॉ. पार्था पी.बिष्णु ने बताया कि इडियोपैथिक पार्किंसंस नामक गंभीर बीमारी से देहरादून की 67 वर्षीय महिता सात सालों से जूझ रही थी। वह शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण खो चुकी थी। कई जगह इलाज कराने पर जब राहत नहीं मिली तो वह ग्राफिक एरा अस्पताल आई। यहां डॉक्टरों ने डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी से उपचार किया। सर्जरी सफल रही और सर्जरी करने के बाद मरीज को तुरंत राहत मिली और अब उनके शरीर में कंपन, अकड़न व असंतुलन जैसे बीमारी के लक्षणों में लगातार तेजी से सुधार हो रहा है। सर्जरी में करीब साढ़े पंद्रह लाख रुपए का खर्चा आया। इस दौरान मेडिकल निदेशक डॉ. पुनीत त्यागी, मेडिकल का लेज के डीन डॉ. एसएल जेठानी भी मौजूद रहे। सर्जरी टीम में डॉ. पार्था पी. विष्णु के साथ ही डॉ. नेहा अग्रवाल, डॉ. पायोज पांडे, डॉ. ज्योति गौतम, डॉ. अंकुर कपूर, डॉ. शेखर बाबू, डॉ निखिल शर्मा, डॉ. स्वाति सिंघल, डॉ. रिजेश आदि शामिल रहे।

 *डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी तकनीक*

डॉक्टर विष्णु के अनुसार, इस सर्जरी में मरीज के मस्तिष्क के अंदर एक छोटा उपकरण प्रत्यारोपित किया जाता है। यह उपकरण मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्रों में इलेक्ट्रिकल इम्पल्स (तरंगे) भेजता है। यह पेसमेकर की तरह काम करके असामान्य गतिविधियों को नियंत्रित करने में सहायता करता है। यह सर्जरी वर्चुअल रिएलिटी साफ्टवेयर के स्टीरियोटेक्टिक निर्देशन से की गई। इसमें मस्तिष्क के दोनों ओर दो पतले माइक्रोइलेक्ट्रोड लगाए गए और उन्हें एक पल्स जनरेटिंग बैटरी से जोड़ा गया, इस प्रक्रिया को सात घंटे में पूरा कर लिया गया। अधिकांश प्रक्रिया में महिला जगी हुई थीं, उन्हें एनेस्थीसिया नहीं दिया गया। कहा कि ऐसे जटिल मामलों में रोगियों का उपचार सर्जरी के बिना संभव नहीं है। इस तरह की सर्जरी उत्तराखंड व आसपास के क्षेत्रों में अब तक नहीं हुई थी।

*क्या होता है पार्किसंस*

पार्किसंस की बीमारी एक किस्म का ब्रेन डिसऑर्डर है। जिसमें लोगों का अपने हाथ, पैर और शरीर के अन्य हिस्सों के मूवमेंट पर कंट्रोल नहीं रहता। हाथ पैरों में कंपन, स्टिफनेस और कभी कभी बैलेंस बनाने में दिक्कत होने लगती है। ये एक किस्म की प्रोग्रेसिव बीमारी है। जो किसी को भी हो सकती है। इसमें मरीज को चलने में और बात करने में मुश्किल होती है। इस बीमारी के केस ज्यादातर 50 से 60 साल की उम्र के बाद के होते हैं, लेकिन फैमिली हिस्ट्री या किसी अन्य कारण से कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।

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