लेखक एवं कवि – राघवेंद्र उनियाल समीक्षक- संपादक ओम प्रकाश (ओपी) जोशी
उत्तरांचल प्रेस क्लब देहरादून में वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखक राघवेंद्र उनियाल समीक्षक एवं संपादक ओम प्रकाश जोशी को अपनी रचना “तुझे लौटना होगा…” भेंट करते हुए।
समीक्षा – प्रस्तुत काव्य-रचना शहर और गाँव के जीवन-मूल्यों का सशक्त, संवेदनशील और विचारोत्तेजक तुलनात्मक चित्रण है। कवि ने अत्यंत सहज भाषा में आधुनिक शहरी सभ्यता और पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति के बीच बढ़ती दूरी, मूल्य-संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को रेखांकित किया है।
रचना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता में निहित गहराई है। “जहाँ कंक्रीट का जंगल है, वह शहर है” जैसे कथन केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि आज के यथार्थ पर तीखी टिप्पणी हैं। इसके विपरीत गाँव को रिश्तों, सहयोग, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। कवि यह स्पष्ट करता है कि विकास केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें संवेदनशीलता, अपनत्व और मानवीय गरिमा का समावेश भी अनिवार्य है।
कविता की संरचना प्रश्नोत्तर या कथनात्मक शैली में है, जो पाठक को लगातार सोचने के लिए विवश करती है। हर पंक्ति शहर और गाँव के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचती है—जहाँ शहर में पहचान दिखावे, साधनों और शोर से बनती है, वहीं गाँव में पहचान रिश्तों, श्रम और सादगी से। यह द्वंद्व ही कविता की आत्मा है।
भाषा प्रवाहपूर्ण, बिंब स्पष्ट और प्रतीक सटीक हैं। टीवी, चौराहे, प्रदूषण, अकेलापन जैसे शब्द शहर की यांत्रिकता को उभारते हैं, जबकि चौपाल, रिश्ते, परंपरा और संस्कृति गाँव की आत्मीयता को जीवंत करते हैं। कविता कहीं भी आक्रामक नहीं होती, बल्कि शांत स्वर में गहरी बात कह जाती है—यही इसकी साहित्यिक शक्ति है।
यह रचना यह भी संकेत देती है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में यदि हमने मानवीय मूल्यों को खो दिया, तो प्रगति निरर्थक हो जाएगी। कवि का दृष्टिकोण संतुलित है; वे विकास के विरोधी नहीं, बल्कि मानव-केंद्रित विकास के पक्षधर दिखाई देते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार, अनुभवी अध्यापक, कुशल मंच संचालक और समाजसेवी होने के कारण लेखक का सामाजिक अनुभव इस कविता में स्पष्ट झलकता है। जीवन को बहुत निकट से देखने का जो विवेक उनके पास है, वही इस रचना को विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाता है।
समग्र रूप से यह कविता पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है और यह प्रश्न छोड़ जाती है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं—एक संवेदनशील समाज की ओर या केवल चमकते, पर भीतर से खोखले शहरों की ओर। साहित्यिक दृष्टि से यह रचना पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के योग्य ही नहीं, बल्कि आज के समय की एक आवश्यक आवाज़ भी है। निष्कर्ष – “तुझे लौटना होगा” एक कविता नहीं, चेतावनी है। यह पाठक से पूछती नहीं बल्कि आदेश देती है।
यह हमें याद दिलाती है कि अगर मनुष्य बचाना है, तो जीवन की दिशा बदलनी होगी। यह रचना सामाजिक विमर्श में, शैक्षिक पाठ्यक्रम में और सार्वजनिक संवाद में स्थान पाने की पूरी हकदार है।