13 वर्षीय अंशिका बिष्ट बनीं संस्कृति की पहचान, आधुनिक दौर में दिया जड़ों से जुड़ाव का संदेश

मोनाल एक्सप्रेस, देहरादून। तेजी से आधुनिक होते शहरों के बीच अपनी भाषा, वेशभूषा और सांस्कृतिक पहचान को संजोकर रखना आसान नहीं होता, लेकिन 13 वर्ष की अंशिका बिष्ट ने यह साबित कर दिया कि अपनी जड़ों पर गर्व करना ही असली पहचान है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर देहरादून के सेंट्रियो मॉल जैसे सार्वजनिक और आधुनिक मंच पर पारंपरिक परिधान और पहाड़ी भाषा के माध्यम से उन्होंने संस्कृति संरक्षण का सशक्त संदेश दिया।

आत्मविश्वास और पहचान का शानदार उदाहरण

कम उम्र में महानगर जैसे माहौल में रहते हुए अंशिका का अपनी मातृभाषा और पारंपरिक पहनावे को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करना सराहनीय है। उनकी यह पहल न केवल उनकी सोच की परिपक्वता को दर्शाती है, बल्कि आज के युवाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत है।

शहरों की चकाचौंध में भी नहीं भूलीं अपनी जड़ें

अक्सर देखा जाता है कि शहरी जीवनशैली के प्रभाव में बच्चे अपनी भाषा और संस्कृति से दूर हो जाते हैं, लेकिन अंशिका बिष्ट ने यह साबित कर दिया कि पहाड़ी होना गर्व की बात है। अपनी भाषा बोलना और पारंपरिक परिधान पहनना हमारी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का सबसे मजबूत माध्यम है।

प्रवासियों के लिए भी एक सशक्त संदेश

अंशिका की यह प्रस्तुति उन सभी लोगों के लिए संदेश है जो रोज़गार या पढ़ाई के कारण अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। “जेठू बुलाण, तेथू पछाड़” कहावत को उन्होंने अपने व्यवहार और प्रस्तुति से जीवंत कर दिखाया।

उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं

अंशिका बिष्ट की यह पहल उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सुंदर प्रयास है। उम्मीद है कि वह आगे भी अपनी कला, भाषा और संस्कृति के माध्यम से प्रदेश और समाज को गौरवान्वित करती रहेंगी।

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